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बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

पृथ्वी की चिंता


 

बढ़ते वैश्विक तापमान और इसके होने वाले परिणामों को लेकर अरसे से चिंता जताई जाती रही है। हालांकि कुछ लोग यह भी कहते रहे हैं कि खतरों को पर्यावरणवादी बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं। पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से गठित अंतर-सरकारी समिति ने जब इस मसले पर पांच साल पहले अपनी रिपोर्ट जारी की, तो यह साफ हो गया कि वाकई दुनिया एक अपूर्व संकट की ओर बढ़ रही है। यह रिपोर्ट दुनिया भर के सैकड़ों वैज्ञानिकों के गहन अध्ययन और विश्लेषण का परिणाम थी। इन पांच सालों में वैश्विक पर्यावरणीय संकट से निपटने की दिशा में क्या प्रयास किए गए हैं यह किसी से
छिपा नहीं है। अधिकतर सुझाव

रविवार, 13 अक्टूबर 2013

खाद्य सुरक्षा की अड़चनें

संसद खाद्य सुरक्षा बिल पास कर चुकी है और सरकार आगामी चुनाव से पहले इसे क्रियान्वित करने में जोर-शोर से जुट गई है। ऐसे में यह देखने का सही समय है कि इसने अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर क्या खलबली मचाई है? अमेरिका ने जिस तरह सार्वजनिक भंडारण के कार्यक्रमों को छूट प्रदान करने के विकासशील देशों (मुख्य रूप से भारत द्वारा आगे बढ़ाए गए) के प्रस्ताव पर अपना रुख खड़ा कर लिया है और वह भूखे और कुपोषित लोगों के पोषण की जरूरतें पूरी करने के लिए सब्सिडी की सीमा बढ़ाने का इच्छुक नजर नहीं आ रहा है उससे यह साफ नजर आ रहा है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल डब्लूटीओ में गंभीर समस्याओं का सामना कर सकता है।

अशक्तों की सुध

 विकलांगों की बाबत सर्वोच्च न्यायालय का फैसला दूरगामी महत्त्व का है। मंगलवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने केंद्र और सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे सरकारी नौकरियों में विकलांगों के लिए तीन फीसद स्थान जरूर आरक्षित करें। यह फैसला उन लोगों के सशक्तीकरण का एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा जो शारीरिक रूप से पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। ऐसे लोगों के सामने रोजगार और आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न कहीं ज्यादा विकट होता है। आरक्षण की सुविधा उनके लिए सम्मानजनक जीवनयापन का

बेहतरी के बावजूद

आयात घटने और निर्यात में बढ़ोतरी के आंकड़े निस्संदेह उत्साहजनक हैं। पिछले महीने निर्यात में साढ़े ग्यारह फीसद की बढ़ोतरी और आयात में अठारह फीसद से कुछ अधिक की कमी के चलते व्यापार घाटा करीब पौने सात अरब तक सिमट आया, जो पिछले तीस महीनों में सबसे निम्न स्तर है। इसके चलते आर्थिक सुस्ती कुछ दूर हुई है। उम्मीद की जा रही है कि इससे डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में कुछ सुधार आएगा। इसे वस्तुओं के अनावश्यक आयात पर लगाम कसने का सकारात्मक परिणाम माना जा रहा है।

ब्रिटिश शासन में सुधार : 1858 से 1919 तक

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1858 का अधिनियम पारित कर शासन ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से अपने हाथ में ले लिया | 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के रूप को देख कर ब्रिटिश सरकार की समझ में आ गया कि पूर्ण रूप से साम्राज्यवादी नीति को अपनाना राजनितिक भविष्य के लिये ठीक नहीं होगा | अतः ब्रिटिश सरकार ने अपनी इस नीति को त्याग कर देशी रजवाडों के साथ मित्रता पूर्ण रिश्तों की शुरुवात की | भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश सत्ता के अधीन हो गया और ब्रिटिश मंत्रिमंडल में भारत मंत्री का पद बनाया गया |

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

पिछड़ेपन का नया मानदंड


भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की अध्यक्षता वाली कमेटी ने राज्यों को धन आवंटित करने का नया ढांचा सुझाया है। इसके मुताबिक हर राज्य को पूर्वनिर्धारित बुनियादी आवंटन होगा और फिर उसके विकास के स्तर को देखते हुए उसे अतिरिक्त धन दिया जाएगा। जिस पृष्ठभूमि में ये पहल हुई, स्वाभाविक रूप से इसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने पाले में लाने की कांग्रेस की कोशिश का हिस्सा माना जाएगा।
लेकिन इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि इससे राज्यों के पिछड़ेपन को मापने का अधिक तार्किक एवं आधुनिक मानदंड प्रचलन में आ सकता है। नया ढांचा बहुआयामी सूचकांक पर आधारित है। यह सूचकांक प्रति व्यक्ति उपभोग, गरीबी के अनुपात आदि जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इसके तहत सभी 28 राज्यों को- न्यूनतम विकसित, कम विकसित और अपेक्षाकृत विकसित- राज्यों की तीन श्रेणियों में रखा गया है।
यह फॉर्मूला स्वीकार होने के बाद कुछ राज्यों को विशेष श्रेणी में रखकर उन्हें अतिरिक्त सहायता देने का चलन खत्म हो जाएगा। बिहार को अभी राज्यों को मिलने वाले कुल धन का 7.42 फीसदी मिलता है। नए तरीके के तहत वह 12.4 प्रतिशत हिस्से का हकदार हो जाएगा। तो यूपीए सरकार उम्मीद कर सकती है कि जिस मकसद से उसने राजन कमेटी बनाई थी, वह पूरा हो जाएगा। बहरहाल, इस पूरे मामले को सिर्फ यूपीए के राजनीतिक समीकरणों के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए।
चूंकि दुनिया भर में विकास और पिछड़ेपन की समझ बदली है, इसलिए यह तो उचित है कि अब भारत में भी राज्यों के मामले में इन्हें मापने का नया मानदंड अपनाया जाए, लेकिन अगर यह पक्षपातपूर्ण महसूस हुआ अथवा यह धारणा बनी कि इसे राजनीतिक स्वार्थ के नजरिये से लागू किया गया है तो इस बारे में दूसरे राज्यों की तरफ से गंभीर आपत्ति उठाई जा सकती है।
इसलिए बेहतर होगा कि सरकार इस बारे में सभी राज्यों एवं राजनीतिक दलों से चर्चा करे और इनके बीच आम सहमति तैयार करे। अगर इस दौरान बुनियादी आवंटन के बारे में किसी हलके से कोई वैकल्पिक राय या फॉर्मूला पेश किया जाता है, तो उस पर भी विचार होना चाहिए। विकास के मुद्दों को दलगत राजनीति से ऊपर रखना जरूरी है, ताकि वे किसी एक दल का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नीति का हिस्सा नजर आएं।


स्रोत- दैनिक भास्कर 

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

भारतीय प्रशासन- एक परिचय एवं इतिहास एवं विकास

भारतीय प्रशासन का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि भारत का इतिहास | भारतीय प्रशासन के ज्ञान का सीधा सम्बन्ध भारतीय इतिहास के ज्ञान से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है | प्रशासन का सरल अर्थ सरकार द्वारा किये जाने वाले कार्यों से लगाया जाता रहा है | किसी भी देश में शासन व्यवस्था चाहे वह राजशाही हो या लोकतान्त्रिक उसका प्रमुख कर्तव्य जनकल्याण ही माना गया है | प्राचीन भारतीय प्रशासनिक चिन्तक चाणक्य ने अपनी रचना ‘अर्थशास्त्र’ में भी इसकी पुष्टि की है | गौरवशाली भारतीय सभ्यता व संस्कृति की प्राचीन काल से वर्तमान तक की परिवर्तन यात्रा में

सांसदों को बचाने की बेसब्री क्यों?


यूपीए सरकार ने अपनी बेसब्री से मुसीबत मोल ले ली है। विडंबना है कि उसके इस कदम का लाभ तो तमाम राजनीतिक दल उठाएंगे, लेकिन सार्वजनिक छवि के नुकसान के रूप में उसकी कीमत सिर्फ कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए को चुकानी होगी। मुद्दा गंभीर आरोपों में सजायाफ्ता सांसद/विधायकों को संरक्षण देने का है। इसके लिए पेश संशोधन विधेयक अभी संसदीय स्थायी समिति के पास है। बजाय इसके कि सरकार उसकी रिपोर्ट का इंतजार करती, उसने अध्यादेश जारी कर संशोधन प्रावधानों को लागू करने का फैसला किया।

ब्रिटिश शासन (ईस्ट इण्डिया कंपनी का शासन ) : 1757-1858

मुग़ल शासन समय काल में ब्रिटेन में ईस्ट इण्डिया कंपनी की स्थापना (सन् 1600 में ) हुई | वैसे तो इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत में आकर यहाँ व्यापार करना था परन्तु भारत की आर्थिक सम्पन्नता व इसकी राजनैतिक अस्थिरता के कारण कंपनी के शासक वर्ग ने भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने हेतु प्रयास करने शुरू कर दिये | कंपनी का शासन गठित किये गए मंडलों(बोर्डो) द्वारा चलाया जाता था जिनमे सबसे महत्वपूर्ण बोर्ड व्यापार मंडल सैनिक मंडल थे | ब्रिटिश सरकार इस कंपनी पर नियंत्रण रखने हेतु

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

ब्रिटिश शासन के आगमन के समय प्रशासनिक प्रणाली (2)

चूँकि ब्रिटिश शासन के आगमन के पश्चात भारतीय प्रशासन के ढांचे में पूर्णतया बदलाव आ गया था और इस बदलाव के पीछे उस समय के मुग़ल प्रशासनिक तंत्र की व्यवस्था के नाकारात्मक व सकारात्मक पक्षों की महत्वपूर्ण  भूमिकाएँ  थी अतः ब्रिटिश शासन के आगमन के पश्चात भारतीय प्रशासनिक तंत्र में हुए सभी प्रकारों के बदलावों के समीक्षा पूर्ण ज्ञान हेतु मुग़ल काल की प्रशासनिक व्यवस्था का समग्र ज्ञान अत्यंत आवश्यक है |