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बढ़ते
वैश्विक तापमान और इसके होने वाले परिणामों को लेकर अरसे से चिंता जताई
जाती रही है। हालांकि कुछ लोग यह भी कहते रहे हैं कि खतरों को पर्यावरणवादी
बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं।
पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से गठित अंतर-सरकारी समिति ने जब इस मसले पर पांच
साल पहले अपनी रिपोर्ट जारी की, तो यह साफ हो गया कि वाकई दुनिया एक
अपूर्व संकट की ओर बढ़ रही है। यह रिपोर्ट दुनिया भर के सैकड़ों वैज्ञानिकों
के गहन अध्ययन और विश्लेषण का परिणाम थी। इन पांच सालों में वैश्विक
पर्यावरणीय संकट से निपटने की दिशा में क्या प्रयास किए गए हैं यह किसी से
छिपा नहीं है। अधिकतर सुझाव
और उपाय विकसित बनाम विकासशील देशों की
मोर्चेबंदी की भेंट चढ़ते गए हैं, मानो यह कोई मानवीय नहीं बल्कि कूटनीतिक
मसला हो! पिछले हफ्ते अंतर-सरकारी समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट जारी की है
और इसके पीछे भी सैकड़ों वैज्ञानिकों का अध्यवसाय है। ताजा अध्ययन से पिछली
रिपोर्ट में दी गई चेतावनियों की जहां एक बार फिर पुष्टि हुई है, वहीं यह
भी साफ हुआ है कि संकट उससे कहीं अधिक गहरा है जितना आमतौर पर सोचा जाता
है। ताजा रिपोर्ट बताती है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का यही क्रम बना
रहा तो इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में चार डिग्री सेल्सियस तक
बढ़ोतरी हो सकती है। यानी इसे दो डिग्री की वृद्धि तक सीमित रखने का लक्ष्य
धरा का धरा रह जाएगा।
यह दुनिया भर में लोगों का आम अनुभव है कि मौसम
में बहुत तीव्र उतार-चढ़ाव हो रहे हैं। इसकी पुष्टि करते हुए रिपोर्ट ढेर
सारे हवाले देती है। अत्यधिक बरसात या सूखा, बर्फ आवरण में कमी और समुद्री
जलसतह का बढ़ना कोईसंयोग नहीं हैं, बल्कि विश्व की पारिस्थितिकी में आ रहे खतरनाक बदलावों के
सूचक और परिणाम हैं। नई रिपोर्ट पिछली रिपोर्ट से एक मायने में जरूर अलग
है; इसने यह रेखांकित किया है कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के लिए प्रमुख
रूप से कॉर्बन उत्सर्जन जिम्मेवार है, न कि मिथेन और नाइट्रस आॅक्साइड जैसी
दूसरी गैसें। लिहाजा, अब यह प्रचार बंद हो जाना चाहिए कि भारत जैसे देशों
में पशुओं की अत्यधिक तादाद या बड़े पैमाने पर धान की खेती आदि भी पृथ्वी के
तापमान में बढ़ोतरी के मुख्य कारक हैं। ग्लोबल वार्मिंग के पीछे कॉर्बन
उत्सर्जन की केंद्रीय भूमिका होने से साफ है कि औद्योगिक प्रदूषण ही समस्या
की जड़ है। अगर कॉर्बन उत्सर्जन मौजूदा स्तर तक सीमित रहे, तो भी पृथ्वी के
वातावरण में जितना जहर इकट्ठा हो चुका है उसके खतरनाक परिणाम दुनिया को
सदियों तक भुगतने पड़ सकते हैं। रिपोर्ट की सबसे खास चेतावनी समुद्री सतह
बढ़ने को लेकर है। यह आशंका जताई गई है कि पृथ्वी के मानचित्र में कई बहुत
त्रासद बदलाव हो सकते हैं। द्वीपीय राष्ट्रों पर वजूद का संकट मंडरा रहा
है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी चेन्नई, मुंबई, कराची जैसे महानगर इस संकट से
अछूते नहीं रह पाएंगे। पर समुद्र में मत्स्य भंडार के लोप होने का क्रम और
पहले ही शुरू हो जाएगा। यह बेहद अफसोस की बात है कि 1997 में क्योतो
समझौते के रूप में दुनिया को जलवायु संकट से बचाने की जो मुहिम शुरू हुई
थी, वह कूटनीतिक दांव-पेच में उलझ गई है।
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