आयात घटने और निर्यात में बढ़ोतरी के आंकड़े
निस्संदेह उत्साहजनक हैं। पिछले महीने निर्यात में साढ़े ग्यारह फीसद की
बढ़ोतरी और आयात में अठारह फीसद से कुछ अधिक की कमी के चलते व्यापार घाटा
करीब पौने सात अरब तक सिमट आया, जो पिछले तीस महीनों में सबसे निम्न स्तर
है।
इसके चलते आर्थिक सुस्ती कुछ दूर हुई है। उम्मीद की जा रही है कि इससे डॉलर
के मुकाबले रुपए की कीमत में कुछ सुधार आएगा। इसे वस्तुओं के अनावश्यक
आयात पर लगाम कसने का सकारात्मक परिणाम माना जा रहा है।
सोने-चांदी की खरीद पर अंकुश लगाने और पेट्रोलियम पदार्थों की खपत कम करने के प्रयास का ही नतीजा है कि सोने-चांदी के आयात में सबसे अधिक करीब अस्सी फीसद की कमी दर्ज की गई तो कच्चे तेल के आयात में छह फीसद की। उद्योग जगत इसे अच्छा संकेत मान रहा है। उसे भरोसा है कि यही रुझान बना रहा तो इस साल भारत करीब साढ़े तीन सौ अरब डॉलर का निर्यात कर सकेगा। निर्यात में बढ़ोतरी के पीछे माना जा रहा है कि विश्व बाजार में मंदी का दौर खत्म हो रहा और वस्तुओं की मांग बढ़ रही है। हालांकि यह स्थिति कितने समय तक रहेगी, कहना मुश्किल है। क्योंकि त्योहारों और शादी-विवाह के मौकों पर सोने-चांदी, उपभोक्ता वस्तुओं की खरीदारी बढ़ जाती है। इसलिए सोने की खरीद पर लगे अंकुश के कमजोर होने की आशंका बनी हुई है। फिर मंदी के दौर से वापस लौटती विश्व अर्थव्यवस्था एकदम से रफ्तार पकड़ेगी और विश्व बाजार में भारतीय वस्तुओं की मांग लगातार बनी रहेगी, दावा नहीं किया जा सकता। डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत के मद्देनजर आयात पर सख्ती जरूर तात्कालिक उपाय साबित हो रहा है, मगर सरकार विश्व व्यापार संगठन के दबावों को कहां तक नजरअंदाज कर पाएगी, देखने की बात है। जिस समय सरकार चालू खाते के घाटे कोलेकर चिंतित थी, उस वक्त भी विश्व व्यापार संगठन के दबाव में उसने आयात शुल्क में ढील दे रखी थी। सोने-चांदी का आयात तेजी से हो रहा था। इसी तरह जमीन-जायदाद, वायदा कारोबार और पूंजी बाजार जैसे गैर-उत्पादक क्षेत्रों में निवेश को लगातार प्रोत्साहन मिल रहा था। माना जा रहा है कि व्यापार घाटा कम होने से रुपए की कीमत संतोषजनक स्तर तक पहुंच जाएगी, जिसके चलते महंगाई घटेगी। लेकिन यह आकलन भरोसेमंद नहीं कहा जा सकता। राजकोषीय घाटा पाटना सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। इसे कम करने के मकसद से सबसिडी का बोझ हलका करने की कवायद की गई, जिसका असर पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर पड़ा। इस तरह तेल का आयात कम होने का खमियाजा आखिरकार आम उपभोक्ता को वस्तुओं पर बढ़ी उत्पादन लागत चुका कर भुगतना पड़ रहा है। इस तरह महंगाई पर काबू पाने की उम्मीद धुंधली ही बनी हुई है। निर्यात में बढ़ोतरी का फायदा ज्यादातर उन्हीं बड़ी कंपनियों को मिल पाता है, जिन्हें सरकार करों में भारी रियायत देती है। इन रियायतों को तार्किक बनाने की जरूरत काफी समय से रेखांकित की जाती रही है, मगर सरकार का रुख सकारात्मक नहीं देखा गया। फिर जैसे ही बाजार में मजबूती के संकेत मिलने लगते हैं, सरकार विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने और उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद को प्रोत्साहित करने के तर्क पर ब्याज दरों में फेर-बदल शुरू कर देती है। इस तरह आयात पर लगाम लगाने की नीति ज्यादा देर तक कठोर नहीं रह पाती। ऐसे में व्यापार घाटे को कम करने के प्रयासों के साथ-साथ दूसरे आर्थिक पहलुओं को भी सुधारने के व्यावहारिक उपायों पर ध्यान देने की जरूरत है।
स्रोत- जनसत्ता
सोने-चांदी की खरीद पर अंकुश लगाने और पेट्रोलियम पदार्थों की खपत कम करने के प्रयास का ही नतीजा है कि सोने-चांदी के आयात में सबसे अधिक करीब अस्सी फीसद की कमी दर्ज की गई तो कच्चे तेल के आयात में छह फीसद की। उद्योग जगत इसे अच्छा संकेत मान रहा है। उसे भरोसा है कि यही रुझान बना रहा तो इस साल भारत करीब साढ़े तीन सौ अरब डॉलर का निर्यात कर सकेगा। निर्यात में बढ़ोतरी के पीछे माना जा रहा है कि विश्व बाजार में मंदी का दौर खत्म हो रहा और वस्तुओं की मांग बढ़ रही है। हालांकि यह स्थिति कितने समय तक रहेगी, कहना मुश्किल है। क्योंकि त्योहारों और शादी-विवाह के मौकों पर सोने-चांदी, उपभोक्ता वस्तुओं की खरीदारी बढ़ जाती है। इसलिए सोने की खरीद पर लगे अंकुश के कमजोर होने की आशंका बनी हुई है। फिर मंदी के दौर से वापस लौटती विश्व अर्थव्यवस्था एकदम से रफ्तार पकड़ेगी और विश्व बाजार में भारतीय वस्तुओं की मांग लगातार बनी रहेगी, दावा नहीं किया जा सकता। डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत के मद्देनजर आयात पर सख्ती जरूर तात्कालिक उपाय साबित हो रहा है, मगर सरकार विश्व व्यापार संगठन के दबावों को कहां तक नजरअंदाज कर पाएगी, देखने की बात है। जिस समय सरकार चालू खाते के घाटे कोलेकर चिंतित थी, उस वक्त भी विश्व व्यापार संगठन के दबाव में उसने आयात शुल्क में ढील दे रखी थी। सोने-चांदी का आयात तेजी से हो रहा था। इसी तरह जमीन-जायदाद, वायदा कारोबार और पूंजी बाजार जैसे गैर-उत्पादक क्षेत्रों में निवेश को लगातार प्रोत्साहन मिल रहा था। माना जा रहा है कि व्यापार घाटा कम होने से रुपए की कीमत संतोषजनक स्तर तक पहुंच जाएगी, जिसके चलते महंगाई घटेगी। लेकिन यह आकलन भरोसेमंद नहीं कहा जा सकता। राजकोषीय घाटा पाटना सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। इसे कम करने के मकसद से सबसिडी का बोझ हलका करने की कवायद की गई, जिसका असर पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर पड़ा। इस तरह तेल का आयात कम होने का खमियाजा आखिरकार आम उपभोक्ता को वस्तुओं पर बढ़ी उत्पादन लागत चुका कर भुगतना पड़ रहा है। इस तरह महंगाई पर काबू पाने की उम्मीद धुंधली ही बनी हुई है। निर्यात में बढ़ोतरी का फायदा ज्यादातर उन्हीं बड़ी कंपनियों को मिल पाता है, जिन्हें सरकार करों में भारी रियायत देती है। इन रियायतों को तार्किक बनाने की जरूरत काफी समय से रेखांकित की जाती रही है, मगर सरकार का रुख सकारात्मक नहीं देखा गया। फिर जैसे ही बाजार में मजबूती के संकेत मिलने लगते हैं, सरकार विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने और उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद को प्रोत्साहित करने के तर्क पर ब्याज दरों में फेर-बदल शुरू कर देती है। इस तरह आयात पर लगाम लगाने की नीति ज्यादा देर तक कठोर नहीं रह पाती। ऐसे में व्यापार घाटे को कम करने के प्रयासों के साथ-साथ दूसरे आर्थिक पहलुओं को भी सुधारने के व्यावहारिक उपायों पर ध्यान देने की जरूरत है।
स्रोत- जनसत्ता
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