संसद खाद्य सुरक्षा बिल पास कर चुकी है और सरकार आगामी चुनाव से पहले
इसे क्रियान्वित करने में जोर-शोर से जुट गई है। ऐसे में यह देखने का सही
समय है कि इसने अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर क्या खलबली मचाई है? अमेरिका ने
जिस तरह सार्वजनिक भंडारण के कार्यक्रमों को छूट प्रदान करने के विकासशील
देशों (मुख्य रूप से भारत द्वारा आगे बढ़ाए गए) के प्रस्ताव पर अपना रुख
खड़ा कर लिया है और वह भूखे और कुपोषित लोगों के पोषण की जरूरतें पूरी करने
के लिए सब्सिडी की सीमा बढ़ाने का इच्छुक नजर नहीं आ रहा है उससे यह साफ
नजर आ रहा है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल डब्लूटीओ में गंभीर समस्याओं
का सामना कर सकता है।
भारत के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने दो-टूक घोषणा कर दी है कि गरीबों और भूखों का पेट भरने के मामले पर कोई समझौता नहीं हो सकता, किंतु अमेरिका के डब्लूटीओ दूत मिशेल पंके ने भारत को निशाना बनाते हुए विकासशील देशों के प्रस्ताव पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि इससे व्यापार में बाधक बनने वाली सब्सिडी के असीमित रूप से बढ़ने का छिद्र बन गया है। इसे पीछे ले जाने वाला कदम बताते हुए उन्होंने कहा कि नया छिद्र उन कुछ उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में ही संभव होगा, जिनके पास इसके इस्तेमाल के लिए पैसा है। अन्य विकासशील देशों को कोई लाभ नहीं होगा और वास्तव में उन्हें इसके दुष्परिणाम भुगतने होंगे। मैं जी-33 देशों के विवादास्पद प्रस्ताव की बात कर रहा हूं। इस समूह में चीन, भारत, इंडोनेशिया, पाकिस्तान सहित अन्य ऐसे देश शामिल हैं जिन्होंने दोहा विकास एजेंडे में खाद्य सुरक्षा, जीविकोपार्जन और ग्रामीण विकास की पूर्ति के लिए कुछ संशोधनों की मांग की थी। यह जानते हुए कि खाद्य सुरक्षा के लिए चावल और गेहूं की सरकारी खरीद कई गुना बढ़ जाएगी, भारत छोटे किसानों से खाद्यान्न की खरीदारी पर सब्सिडी की सीमा में वृद्धि चाहता है, ताकि व्यापार सब्सिडी के नियमों का उल्लंघन न हो। भारत चाहता है कि खाद्य सुरक्षा की पूर्ति के लिए सब्सिडी समग्र समर्थन माप की अधिकतम सीमा के दायरे से बाहर होनी चाहिए। विकासशील देश गरीब किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर जो खाद्यान्न खरीदते हैं वह एएमएस की सीमा में नहीं जुड़ना चाहिए। साथ ही भारत सरकारी स्तर पर खाद्यान्न के भंडारण की सीमा में भी उचित संशोधन की भी वकालत कर रहा है। यह सीमा वर्तमान में गेहूं और चावल के कुल उत्पादन का दस प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में, जी-33 देश आगामी वार्ता में ऐसे प्रावधान चाहते हैं जो उनकी पूरी आबादी के लिए हर समय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।
भारत में धान का सरकारी खरीद मूल्य 24 प्रतिशत बढ़ गया है, जो 10 प्रतिशत की अधिकतम सीमा से काफी अधिक है। इसी प्रकार चीन, इंडोनेशिया, थाइलैंड और मिस्र भी विश्व व्यापार संगठन द्वारा निर्धारित की गई सीमा को लांघ चुके हैं। डब्लूटीओ प्रमुख का पद छोड़ने जा रहे पास्कल लामी से पर्दे के पीछे आनंद शर्मा की बातचीत के बावजूद नामित नए महानिदेशक ब्राजील के रोबर्टो कार्वाल्हो और अमेरिका ने अपना रुख कड़ा कर लिया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर भारत का नया प्रस्ताव अस्वीकृत नहीं किया जाता तो डब्लूटीओ वार्ता में विसंगतियों का सिलसिला जोर पकड़ लेगा। इंडोनेशिया के बाली में दिसंबर में होने वाले मंत्री स्तरीय सम्मेलन में भारत का खाद्य सुरक्षा बिल प्रमुख एजेंडा है। दिलचस्प बात यह है कि भारत का प्रस्ताव विकसित देशों के व्यापार को सुविधाजनक बनाने के प्रस्ताव से करीब से जुड़ा हुआ है। व्यापार के सरलीकरण से तात्पर्य है कि बंदरगाहों पर आवश्यक ढांचे की स्थापना करना और परिवहन व संचार सुविधाओं का विकास करना ताकि व्यापार का संचालन आसान हो सके। दूसरे शब्दों में, विकसित देश अपनी कृषि कंपनियों का व्यापार बढ़ाने के लिए विकासशील देशों को कृषि उपजों की ढुलाई, लदान आदि ढांचागत सुविधाओं में निवेश पर जोर दे रहे हैं। इस समझौते में विवाद के करीब 600 बिंदु हैं, जिन्हें डब्लूटीओ की भाषा में ब्रैकेट कहा जाता है। इनका विकासशील देशों के घरेलू कृषि क्षेत्र पर घातक असर पड़ेगा। दुर्भाग्य से आनंद शर्मा इस व्यापार सरलीकरण समझौते के समर्थन में खड़े हैं, बिना आकलन करे कि इसका भारत के कृषि संकट और खाद्य सुरक्षा जरूरतों पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
यह समझना बहुत जरूरी है कि गरीबों और जरूरतमंदों की खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जी-33 प्रस्ताव कितना महत्वपूर्ण है। हमें पता होना चाहिए कि एएमएस की गणना 1986-88 के दामों के आधार पर की गई। तबसे और खासतौर पर 2007 के बाद से वैश्विक खाद्य संकट गहरा गया है तथा खाद्य पदार्थो के दामों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। 1986-88 के संदर्भित मूल्यों की प्रासंगिकता खत्म हो चुकी है, क्योंकि उस समय खाद्यान्न के दाम काफी कम थे। दूसरे, अमेरिका और यूरोप व्यापार सब्सिडी की अधिकतम सीमा का उल्लंघन करते रहे हैं। वास्तव में, विकसित देश इस तथ्य पर हर्ष व्यक्त कर चुके हैं कि भारी-भरकम कृषि सब्सिडी, जिसका करीब 80 प्रतिशत हिस्सा बड़ी कंपनियों और अमीर किसानों की झोली में जाता है, बाली बैठक के एजेंडे में शामिल नहीं है। फ्रांस के विश्लेषक जेकुअस बर्टहेल्ट इसे पूरी तरह अनुचित ठहराते हैं। 2010 में भारत ने 47.5 करोड़ लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रति व्यक्ति मात्र 58 किलोग्राम खाद्यान्न दिया, जबकि अमेरिका 6.5 करोड़ लोगों को 385 किलोग्राम प्रति व्यक्ति खाद्य सब्सिडी प्रदान करता है। यह सब्सिडी खाद्य कूपन और बाल पोषण कार्यक्रम आदि के माध्यम से मिलती है।
गरीब किसानों से खरीदे जाने वाले धान और गेहूं का मतलब यह नहीं है कि इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ते दामों में बेचा जाएगा। असल में, जेकुअस बर्टहेल्ट ने कहा है कि 1986-88 में अंतरराष्ट्रीय दामों में गिरावट अमेरिका और यूरोप द्वारा सस्ती दरों पर खाद्यान्न की आपूर्ति करने से आई थी। अमेरिका और यूरोप की कुल खाद्यान्न के निर्यात में 53.2 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ये देश आसानी से विश्व को सस्ते निर्यात से पाटने की क्षमता रखते हैं। इसलिए 1986-88 के जिन मूल्यों को आधार मूल्य बनाया गया है, 2012-13 में वे बिल्कुल बेमानी और बेतुके सिद्ध हो जाते हैं। डब्लूटीओ वार्ताओं में विकसित देशों की दबंगई ही चलती है। अगर अमेरिका और यूरोप जी-33 देशों के प्रस्ताव का विरोध करते हैं तो भारत के सामने खाद्य सुरक्षा बिल को क्रियान्वित करना संभव नहीं रह जाएगा और तब डब्लूटीओ को दरकिनार करने के लिए अध्यादेश का विकल्प भी नहीं बचेगा।
स्रोत- दैनिक जागरण
भारत के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने दो-टूक घोषणा कर दी है कि गरीबों और भूखों का पेट भरने के मामले पर कोई समझौता नहीं हो सकता, किंतु अमेरिका के डब्लूटीओ दूत मिशेल पंके ने भारत को निशाना बनाते हुए विकासशील देशों के प्रस्ताव पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि इससे व्यापार में बाधक बनने वाली सब्सिडी के असीमित रूप से बढ़ने का छिद्र बन गया है। इसे पीछे ले जाने वाला कदम बताते हुए उन्होंने कहा कि नया छिद्र उन कुछ उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में ही संभव होगा, जिनके पास इसके इस्तेमाल के लिए पैसा है। अन्य विकासशील देशों को कोई लाभ नहीं होगा और वास्तव में उन्हें इसके दुष्परिणाम भुगतने होंगे। मैं जी-33 देशों के विवादास्पद प्रस्ताव की बात कर रहा हूं। इस समूह में चीन, भारत, इंडोनेशिया, पाकिस्तान सहित अन्य ऐसे देश शामिल हैं जिन्होंने दोहा विकास एजेंडे में खाद्य सुरक्षा, जीविकोपार्जन और ग्रामीण विकास की पूर्ति के लिए कुछ संशोधनों की मांग की थी। यह जानते हुए कि खाद्य सुरक्षा के लिए चावल और गेहूं की सरकारी खरीद कई गुना बढ़ जाएगी, भारत छोटे किसानों से खाद्यान्न की खरीदारी पर सब्सिडी की सीमा में वृद्धि चाहता है, ताकि व्यापार सब्सिडी के नियमों का उल्लंघन न हो। भारत चाहता है कि खाद्य सुरक्षा की पूर्ति के लिए सब्सिडी समग्र समर्थन माप की अधिकतम सीमा के दायरे से बाहर होनी चाहिए। विकासशील देश गरीब किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर जो खाद्यान्न खरीदते हैं वह एएमएस की सीमा में नहीं जुड़ना चाहिए। साथ ही भारत सरकारी स्तर पर खाद्यान्न के भंडारण की सीमा में भी उचित संशोधन की भी वकालत कर रहा है। यह सीमा वर्तमान में गेहूं और चावल के कुल उत्पादन का दस प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में, जी-33 देश आगामी वार्ता में ऐसे प्रावधान चाहते हैं जो उनकी पूरी आबादी के लिए हर समय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।
भारत में धान का सरकारी खरीद मूल्य 24 प्रतिशत बढ़ गया है, जो 10 प्रतिशत की अधिकतम सीमा से काफी अधिक है। इसी प्रकार चीन, इंडोनेशिया, थाइलैंड और मिस्र भी विश्व व्यापार संगठन द्वारा निर्धारित की गई सीमा को लांघ चुके हैं। डब्लूटीओ प्रमुख का पद छोड़ने जा रहे पास्कल लामी से पर्दे के पीछे आनंद शर्मा की बातचीत के बावजूद नामित नए महानिदेशक ब्राजील के रोबर्टो कार्वाल्हो और अमेरिका ने अपना रुख कड़ा कर लिया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर भारत का नया प्रस्ताव अस्वीकृत नहीं किया जाता तो डब्लूटीओ वार्ता में विसंगतियों का सिलसिला जोर पकड़ लेगा। इंडोनेशिया के बाली में दिसंबर में होने वाले मंत्री स्तरीय सम्मेलन में भारत का खाद्य सुरक्षा बिल प्रमुख एजेंडा है। दिलचस्प बात यह है कि भारत का प्रस्ताव विकसित देशों के व्यापार को सुविधाजनक बनाने के प्रस्ताव से करीब से जुड़ा हुआ है। व्यापार के सरलीकरण से तात्पर्य है कि बंदरगाहों पर आवश्यक ढांचे की स्थापना करना और परिवहन व संचार सुविधाओं का विकास करना ताकि व्यापार का संचालन आसान हो सके। दूसरे शब्दों में, विकसित देश अपनी कृषि कंपनियों का व्यापार बढ़ाने के लिए विकासशील देशों को कृषि उपजों की ढुलाई, लदान आदि ढांचागत सुविधाओं में निवेश पर जोर दे रहे हैं। इस समझौते में विवाद के करीब 600 बिंदु हैं, जिन्हें डब्लूटीओ की भाषा में ब्रैकेट कहा जाता है। इनका विकासशील देशों के घरेलू कृषि क्षेत्र पर घातक असर पड़ेगा। दुर्भाग्य से आनंद शर्मा इस व्यापार सरलीकरण समझौते के समर्थन में खड़े हैं, बिना आकलन करे कि इसका भारत के कृषि संकट और खाद्य सुरक्षा जरूरतों पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
यह समझना बहुत जरूरी है कि गरीबों और जरूरतमंदों की खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जी-33 प्रस्ताव कितना महत्वपूर्ण है। हमें पता होना चाहिए कि एएमएस की गणना 1986-88 के दामों के आधार पर की गई। तबसे और खासतौर पर 2007 के बाद से वैश्विक खाद्य संकट गहरा गया है तथा खाद्य पदार्थो के दामों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। 1986-88 के संदर्भित मूल्यों की प्रासंगिकता खत्म हो चुकी है, क्योंकि उस समय खाद्यान्न के दाम काफी कम थे। दूसरे, अमेरिका और यूरोप व्यापार सब्सिडी की अधिकतम सीमा का उल्लंघन करते रहे हैं। वास्तव में, विकसित देश इस तथ्य पर हर्ष व्यक्त कर चुके हैं कि भारी-भरकम कृषि सब्सिडी, जिसका करीब 80 प्रतिशत हिस्सा बड़ी कंपनियों और अमीर किसानों की झोली में जाता है, बाली बैठक के एजेंडे में शामिल नहीं है। फ्रांस के विश्लेषक जेकुअस बर्टहेल्ट इसे पूरी तरह अनुचित ठहराते हैं। 2010 में भारत ने 47.5 करोड़ लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रति व्यक्ति मात्र 58 किलोग्राम खाद्यान्न दिया, जबकि अमेरिका 6.5 करोड़ लोगों को 385 किलोग्राम प्रति व्यक्ति खाद्य सब्सिडी प्रदान करता है। यह सब्सिडी खाद्य कूपन और बाल पोषण कार्यक्रम आदि के माध्यम से मिलती है।
गरीब किसानों से खरीदे जाने वाले धान और गेहूं का मतलब यह नहीं है कि इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ते दामों में बेचा जाएगा। असल में, जेकुअस बर्टहेल्ट ने कहा है कि 1986-88 में अंतरराष्ट्रीय दामों में गिरावट अमेरिका और यूरोप द्वारा सस्ती दरों पर खाद्यान्न की आपूर्ति करने से आई थी। अमेरिका और यूरोप की कुल खाद्यान्न के निर्यात में 53.2 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ये देश आसानी से विश्व को सस्ते निर्यात से पाटने की क्षमता रखते हैं। इसलिए 1986-88 के जिन मूल्यों को आधार मूल्य बनाया गया है, 2012-13 में वे बिल्कुल बेमानी और बेतुके सिद्ध हो जाते हैं। डब्लूटीओ वार्ताओं में विकसित देशों की दबंगई ही चलती है। अगर अमेरिका और यूरोप जी-33 देशों के प्रस्ताव का विरोध करते हैं तो भारत के सामने खाद्य सुरक्षा बिल को क्रियान्वित करना संभव नहीं रह जाएगा और तब डब्लूटीओ को दरकिनार करने के लिए अध्यादेश का विकल्प भी नहीं बचेगा।
स्रोत- दैनिक जागरण
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