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बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

सांसदों को बचाने की बेसब्री क्यों?


यूपीए सरकार ने अपनी बेसब्री से मुसीबत मोल ले ली है। विडंबना है कि उसके इस कदम का लाभ तो तमाम राजनीतिक दल उठाएंगे, लेकिन सार्वजनिक छवि के नुकसान के रूप में उसकी कीमत सिर्फ कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए को चुकानी होगी। मुद्दा गंभीर आरोपों में सजायाफ्ता सांसद/विधायकों को संरक्षण देने का है। इसके लिए पेश संशोधन विधेयक अभी संसदीय स्थायी समिति के पास है। बजाय इसके कि सरकार उसकी रिपोर्ट का इंतजार करती, उसने अध्यादेश जारी कर संशोधन प्रावधानों को लागू करने का फैसला किया।

नतीजतन, भाजपा से लेकर वामपंथी दल तक सरकार की बेताबी के खिलाफ सामने आ गए हैं और इस मुद्दे पर यूपीए अलग-थलग पड़ गया है। उधर, इस सवाल पर सरकार को फिर से न्यायपालिका की फटकार सुननी पड़ सकती है। सरकार ने प्रस्तावित अध्यादेश में जनप्रतिनिधित्व कानून ((संशोधन एवं विधिमान्यकरण)) विधेयक-2013 के प्रावधानों को शामिल किया है, जबकि इस बिल में दो ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे न तो सरकार का मकसद पूरा होगा और न ही जिनके न्यायिक कसौटियों पर खरा उतरने की संभावना है।
इस वर्ष जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8((4)) को रद्द करते हुए फैसला दिया कि अगर किसी सांसद/विधायक को किसी आपराधिक मामले में दो साल या उससे अधिक की कैद सुनाई जाती है, तो उसकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द हो जाएगी। अब अध्यादेश के जरिये सरकार यह प्रावधान करने जा रही है कि ऐसी सजा होने पर भी सदस्यता रद्द नहीं होगी, मगर संबंधित सदस्य न तो सदन में मतदान कर सकेगा और न ही उसे वेतन-भत्ते मिलेंगे। जानकारों ने ध्यान दिलाया है कि सांसद/विधायकों को सदन में वोट डालने का अधिकार संविधान से मिला है।
इसे किसी अध्यादेश या कानून से कैसे छीना जा सकता है? फिर वेतन-भत्तों का प्रावधान सांसदों के वेतन-भत्ता एवं पेंशन कानून-1954 के तहत है। जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन से उन्हें इससे कैसे वंचित किया जा सकता है? फिर अगर सदस्य मतदान नहीं करेंगे, तो सदन को संरक्षण देने के जिस मकसद से उनकी सदस्यता कायम रहने का प्रावधान था, वह उद्देश्य कैसे पूरा होगा? सरकार ने इन गंभीर प्रश्नों का उत्तर ढूढ़े बिना जल्दबाजी दिखाई है। बेहतर होगा, वह पुनर्विचार करे और कदम वापस खींच ले।

स्रोत- दैनिक भास्कर 

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