विकलांगों की बाबत सर्वोच्च न्यायालय का
फैसला दूरगामी महत्त्व का है। मंगलवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए
न्यायालय ने केंद्र और सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे सरकारी नौकरियों
में विकलांगों के लिए तीन फीसद स्थान जरूर आरक्षित करें।
यह फैसला उन लोगों के सशक्तीकरण का एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा जो शारीरिक
रूप से पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। ऐसे लोगों के सामने रोजगार और आर्थिक
सुरक्षा का प्रश्न कहीं ज्यादा विकट होता है। आरक्षण की सुविधा उनके लिए
सम्मानजनक जीवनयापन का
सहारा बनेगी। यों अदालत का फैसला कोई नई पहल नहीं है। विकलांगों के लिए तीन फीसद कोटे का प्रावधान पहले से रहा है। मगर सरकारों ने कभी इस पर संजीदगी से अमल नहीं किया। विकलांग हमारे समाज का शायद सबसे कमजोर समुदाय हैं। उन्हें पढ़ाई-लिखाई, कहीं आने-जाने से लेकर जीविकोपार्जन तक तमाम तरह की मुश्किलें उठानी पड़ती हैं। समाज के बेतुके पूर्वग्रहों का भी सामना करना पड़ता है। कई बार परिजन भी साथ नहीं देते। इन तमाम कठिनाइयों के मद््देनजर उचित ही उनके लिए सरकारी नौकरियों में तीन प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। संबंधित कानून 1995 में बना और इसके अगले साल सात फरवरी को लागू हुआ। लेकिन इसके अमल में काफी कोताही बरती जाती रही है। कानून अधिसूचित होने के अठारह साल बाद भी ज्यादातर जगहों पर उन्हें आरक्षण की सुविधा नहीं मिल पाती है। इसी की बिना पर विकलांगों के राष्ट्रीय संगठन ने दिल्ली हाइकोर्ट में याचिका दायर की थी। लेकिन उनकी शिकायत के प्रति संवेदनशीलता दिखाने के बजाय केंद्र सरकार ने उस याचिका के खिलाफ सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह अलग बात है कि यह कदम उलटा पड़ा। सर्वोच्च अदालत ने विकलांगों के लिए तीन फीसद आरक्षण के प्रावधान को सही ठहराया और केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी कंपनियों में उसे कड़ाई से लागू करने को कहा। साथ में इसके लिए तीन महीने की समय-सीमा निर्धारित कर दी और यह चेतावनी भी दी कि अगर उसके आदेश के अनुपालन में ढिलाई बरती गई तो इसे अदालत की अवमानना समझा जाएगा। सुनवाई के क्रम में केंद्र सरकार के वकील ने यह दलील पेश की कि अनुसूचित जाति के पंद्रह फीसद, अनुसूचित जनजाति के सात फीसद और पिछड़े वर्ग के सत्ताईस फीसद कोटे को मिला कर आरक्षण उनचास फीसद हो जाता है। ऐसे में विकलांगों के लिए तीन फीसद कोटे से आरक्षण की पचास फीसद सीमा का उल्लंघन होगा, जिसे खुद सर्वोच्च न्यायालय ने तय किया हुआ है। लेकिन न्यायालय ने यह तर्क खारिज कर दिया, इसलिए कि अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के आरक्षण सामाजिक आधार पर दिए गए हैं, जबकि विकलांग कोटे में सभी जातियों के लोग आते हैं। इस तरह अदालत के फैसले ने स्वाभाविक ही विकलांग कोटे को सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण से अलग रखा है। यों कई राज्यों में आरक्षण पचास फीसद से अधिक है, पर उसे संविधान की नौवीं अनुसूची के तहत रख कर न्यायिक हस्तक्षेप से परे रखने की तजवीज की गई है। अलबत्ता यह मसला भी अदालत के विचाराधीन है। तीन फीसद आरक्षण को सख्ती से लागू करने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के तौर पर विकलांगों ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। पर यह भी जरूरी है कि स्कूल-कॉलेज में उन्हें आसानी से दाखिला मिले और स्वरोजगार के लिए बैंकों से आसान शर्तों और रियायती ब्याज दरों पर कर्ज मुहैया कराया जाए। उनके अनुकूल आवागमन की सुविधाएं हों। बहुत-से लोग सड़क दुर्घटनाओं और दूसरे हादसों के चलते अशक्त हो जाते हैं। अक्सर उन्हें पर्याप्त मुआवजा नहीं मिल पाता; फिर इसके लिए उन्हें अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। जाहिर है, उनके लिए और भी बहुत कुछ किए जाने की दरकार है।
स्रोत- जनसत्ता संपादकीय
सहारा बनेगी। यों अदालत का फैसला कोई नई पहल नहीं है। विकलांगों के लिए तीन फीसद कोटे का प्रावधान पहले से रहा है। मगर सरकारों ने कभी इस पर संजीदगी से अमल नहीं किया। विकलांग हमारे समाज का शायद सबसे कमजोर समुदाय हैं। उन्हें पढ़ाई-लिखाई, कहीं आने-जाने से लेकर जीविकोपार्जन तक तमाम तरह की मुश्किलें उठानी पड़ती हैं। समाज के बेतुके पूर्वग्रहों का भी सामना करना पड़ता है। कई बार परिजन भी साथ नहीं देते। इन तमाम कठिनाइयों के मद््देनजर उचित ही उनके लिए सरकारी नौकरियों में तीन प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। संबंधित कानून 1995 में बना और इसके अगले साल सात फरवरी को लागू हुआ। लेकिन इसके अमल में काफी कोताही बरती जाती रही है। कानून अधिसूचित होने के अठारह साल बाद भी ज्यादातर जगहों पर उन्हें आरक्षण की सुविधा नहीं मिल पाती है। इसी की बिना पर विकलांगों के राष्ट्रीय संगठन ने दिल्ली हाइकोर्ट में याचिका दायर की थी। लेकिन उनकी शिकायत के प्रति संवेदनशीलता दिखाने के बजाय केंद्र सरकार ने उस याचिका के खिलाफ सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया। यह अलग बात है कि यह कदम उलटा पड़ा। सर्वोच्च अदालत ने विकलांगों के लिए तीन फीसद आरक्षण के प्रावधान को सही ठहराया और केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी कंपनियों में उसे कड़ाई से लागू करने को कहा। साथ में इसके लिए तीन महीने की समय-सीमा निर्धारित कर दी और यह चेतावनी भी दी कि अगर उसके आदेश के अनुपालन में ढिलाई बरती गई तो इसे अदालत की अवमानना समझा जाएगा। सुनवाई के क्रम में केंद्र सरकार के वकील ने यह दलील पेश की कि अनुसूचित जाति के पंद्रह फीसद, अनुसूचित जनजाति के सात फीसद और पिछड़े वर्ग के सत्ताईस फीसद कोटे को मिला कर आरक्षण उनचास फीसद हो जाता है। ऐसे में विकलांगों के लिए तीन फीसद कोटे से आरक्षण की पचास फीसद सीमा का उल्लंघन होगा, जिसे खुद सर्वोच्च न्यायालय ने तय किया हुआ है। लेकिन न्यायालय ने यह तर्क खारिज कर दिया, इसलिए कि अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के आरक्षण सामाजिक आधार पर दिए गए हैं, जबकि विकलांग कोटे में सभी जातियों के लोग आते हैं। इस तरह अदालत के फैसले ने स्वाभाविक ही विकलांग कोटे को सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण से अलग रखा है। यों कई राज्यों में आरक्षण पचास फीसद से अधिक है, पर उसे संविधान की नौवीं अनुसूची के तहत रख कर न्यायिक हस्तक्षेप से परे रखने की तजवीज की गई है। अलबत्ता यह मसला भी अदालत के विचाराधीन है। तीन फीसद आरक्षण को सख्ती से लागू करने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के तौर पर विकलांगों ने एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। पर यह भी जरूरी है कि स्कूल-कॉलेज में उन्हें आसानी से दाखिला मिले और स्वरोजगार के लिए बैंकों से आसान शर्तों और रियायती ब्याज दरों पर कर्ज मुहैया कराया जाए। उनके अनुकूल आवागमन की सुविधाएं हों। बहुत-से लोग सड़क दुर्घटनाओं और दूसरे हादसों के चलते अशक्त हो जाते हैं। अक्सर उन्हें पर्याप्त मुआवजा नहीं मिल पाता; फिर इसके लिए उन्हें अदालतों में लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। जाहिर है, उनके लिए और भी बहुत कुछ किए जाने की दरकार है।
स्रोत- जनसत्ता संपादकीय
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