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शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

पिछड़ेपन का नया मानदंड


भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की अध्यक्षता वाली कमेटी ने राज्यों को धन आवंटित करने का नया ढांचा सुझाया है। इसके मुताबिक हर राज्य को पूर्वनिर्धारित बुनियादी आवंटन होगा और फिर उसके विकास के स्तर को देखते हुए उसे अतिरिक्त धन दिया जाएगा। जिस पृष्ठभूमि में ये पहल हुई, स्वाभाविक रूप से इसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने पाले में लाने की कांग्रेस की कोशिश का हिस्सा माना जाएगा।
लेकिन इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि इससे राज्यों के पिछड़ेपन को मापने का अधिक तार्किक एवं आधुनिक मानदंड प्रचलन में आ सकता है। नया ढांचा बहुआयामी सूचकांक पर आधारित है। यह सूचकांक प्रति व्यक्ति उपभोग, गरीबी के अनुपात आदि जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इसके तहत सभी 28 राज्यों को- न्यूनतम विकसित, कम विकसित और अपेक्षाकृत विकसित- राज्यों की तीन श्रेणियों में रखा गया है।
यह फॉर्मूला स्वीकार होने के बाद कुछ राज्यों को विशेष श्रेणी में रखकर उन्हें अतिरिक्त सहायता देने का चलन खत्म हो जाएगा। बिहार को अभी राज्यों को मिलने वाले कुल धन का 7.42 फीसदी मिलता है। नए तरीके के तहत वह 12.4 प्रतिशत हिस्से का हकदार हो जाएगा। तो यूपीए सरकार उम्मीद कर सकती है कि जिस मकसद से उसने राजन कमेटी बनाई थी, वह पूरा हो जाएगा। बहरहाल, इस पूरे मामले को सिर्फ यूपीए के राजनीतिक समीकरणों के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए।
चूंकि दुनिया भर में विकास और पिछड़ेपन की समझ बदली है, इसलिए यह तो उचित है कि अब भारत में भी राज्यों के मामले में इन्हें मापने का नया मानदंड अपनाया जाए, लेकिन अगर यह पक्षपातपूर्ण महसूस हुआ अथवा यह धारणा बनी कि इसे राजनीतिक स्वार्थ के नजरिये से लागू किया गया है तो इस बारे में दूसरे राज्यों की तरफ से गंभीर आपत्ति उठाई जा सकती है।
इसलिए बेहतर होगा कि सरकार इस बारे में सभी राज्यों एवं राजनीतिक दलों से चर्चा करे और इनके बीच आम सहमति तैयार करे। अगर इस दौरान बुनियादी आवंटन के बारे में किसी हलके से कोई वैकल्पिक राय या फॉर्मूला पेश किया जाता है, तो उस पर भी विचार होना चाहिए। विकास के मुद्दों को दलगत राजनीति से ऊपर रखना जरूरी है, ताकि वे किसी एक दल का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नीति का हिस्सा नजर आएं।


स्रोत- दैनिक भास्कर 

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