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रविवार, 13 अक्टूबर 2013

ब्रिटिश शासन में सुधार : 1858 से 1919 तक

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश सरकार ने 1858 का अधिनियम पारित कर शासन ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से अपने हाथ में ले लिया | 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के रूप को देख कर ब्रिटिश सरकार की समझ में आ गया कि पूर्ण रूप से साम्राज्यवादी नीति को अपनाना राजनितिक भविष्य के लिये ठीक नहीं होगा | अतः ब्रिटिश सरकार ने अपनी इस नीति को त्याग कर देशी रजवाडों के साथ मित्रता पूर्ण रिश्तों की शुरुवात की | भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश सत्ता के अधीन हो गया और ब्रिटिश मंत्रिमंडल में भारत मंत्री का पद बनाया गया |
              1861 के अधिनियम के पारित होने के पश्चात वायसराय के अधिकारों में वृधि हुई | इसी अधिनियम के पश्चात भारत में पोर्टफोलियों का पालन किया गया और विभागों की रचना कर कार्यों का स्पष्ट विभाजन किया गया | वायसराय की काउंसिल के बहुमत का भारत मंत्री व वायसराय के बीच निजी पत्र वयवहार के सम्बन्ध में कोई महत्व नहीं था | इस अधिनियम में काउंसिल को केवल कानून बनाने का अधिकार दिया गया था | अंतिम निर्णय वायसराय के विवेक पर होता था |
              1892 के अधिनियम में वायसराय की काउंसिल के सदस्यों की संख्या बड़ा दी गयी तथा सदस्यों को बजट आदि विषयों पर प्रश्न पूछने का अधिकार भी मिल गया | परन्तु कार्यशील नौकरशाही पर लगाम नहीं लगायी गयी |
              भारत में सुलग रहे राष्ट्रीय आंदोलन को भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस (1885) की स्थापना करके संगठित किया गया | इसका प्रारंभिक उद्देश्य संवैधानिक तरीकों से शासन में सुधार लाना था | प्रारम्भ में ब्रिटिश सरकार ने इस संस्था को समर्थन दिया परन्तु इसके पीछे भारतीय जनता के मन में उपज रहे असंतोष को दबाना व भारत में अपने साम्राज्य को बचाना था | परन्तु धीरे -धीरे इस संस्था में कुछ  गरमपंथी विचारधारा वाले लोगो का पर्दापण होता गया और काँग्रेस ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कार्यवाही करने हेतु आंदोलनों का व्यापक प्रयोग कर ब्रिटिश सरकार को विभिन्न सुधारों को लागू करने हेतु बाध्य कर दिया |

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