भारतीय प्रशासन का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि भारत का इतिहास |
भारतीय प्रशासन के ज्ञान का सीधा सम्बन्ध भारतीय इतिहास के ज्ञान से अभिन्न रूप से
जुड़ा हुआ है | प्रशासन का सरल अर्थ सरकार द्वारा किये जाने वाले कार्यों से लगाया
जाता रहा है | किसी भी देश में शासन व्यवस्था चाहे वह राजशाही हो या लोकतान्त्रिक
उसका प्रमुख कर्तव्य जनकल्याण ही माना गया है | प्राचीन भारतीय प्रशासनिक चिन्तक
चाणक्य ने अपनी रचना ‘अर्थशास्त्र’ में भी इसकी पुष्टि की है | गौरवशाली भारतीय सभ्यता
व संस्कृति की प्राचीन काल से वर्तमान तक की परिवर्तन यात्रा में
भारतीय लोक प्रशासन अपने विभिन्न रूपों से होते हुए वर्तमान स्वरुप में पहुंचा है | अतः जितना हम इतिहास में पीछे जायेंगे उतना हम भारतीय प्रशासन की कार्यप्रणाली को विभिन्न एतिहासिक परिपेक्ष्य के सम्बन्ध में समझ सकने में सक्षम हो पाएंगे |
मोहनजोदड़ो एवं सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों की प्राप्ति के पश्चात प्राचीन काल में नगरीय प्रशासन के होने की पुष्टि हो चुकी है | अतः यह स्वयं ही सिद्ध हो जाता है कि अगर नगरीय प्रशासन था तो उसका संचालन भी प्रशासनिक अधिकारियों व कार्मिकों द्वारा किया जाता था | वैदिक काल में प्रशासन का स्वरुप राजतंत्रात्मक था जिसमें जन-प्रिय राजा का चुनाव एक 'समिति' नामक नागरिक संस्था द्वारा किया जाता था |उत्तर वेदिक काल के बाद राजा का पद पैत्रक हो गया | राजा की सहायता करने हेतु सभा तथा मंत्रिपरिषद का गठन किया जाता था | केंद्रीय प्रशासन विभिन्न विभागों द्वारा संचालित किया जाता था | गाँवो के समूह बनाने के साथ ही प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण को बढावा मिला | 10 ग्रामों का अधिकारी ग्रामिक, 20 का विशपति, 100 का शतग्रामी और 1000 ग्रामों का अधिकारी अधिपति कहलाता था |
मौर्यकाल में कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र को प्राचीन भारतीय लोक प्रशासन के व्यवहारिक पक्षों को समझने हेतु प्रामाणिक ग्रन्थ माना गया है | इस ग्रन्थ में कौटिल्य ने शासन कला एवं राजनीति का ज्ञान तथा कृषि, व्यापार, धर्म-अधर्म ,दर्शन , तर्क जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डाला है |
कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजा को राज्य के शासन के सफल संचालन हेतु योग्य मंत्रियों तथा कर्मचारियों की नियुक्ति करने के साथ-साथ राज्य की आय बढानें के लिये सुदृढ़ आर्थिक नीति का पक्ष लेते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाने पर बल देने को कहा है | अर्थशास्त्र में धर्मनिरपेक्ष राज्य की विशेषताओं का वर्णन करते हुए किसी भी राज्य के लिये इसे उपयुक्त माना है | भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिये मौर्यकाल में कार्मिकों के लिये पुरुस्कार और दंड दोनों की व्यवस्था की गयी थी | कौटिल्य की अर्थशास्त्र के अतिरिक्त मेगास्थनीज की इंडिका , फाह्यान की फू-कुओ-की(बुद्ध के देश की गाथा) तथा ह्वेनसांग की सि-यू-की (पश्चिमी दुनिया का वृतांत) में भी प्राचीन भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन किया गया है |
क्रमशः
भारतीय लोक प्रशासन अपने विभिन्न रूपों से होते हुए वर्तमान स्वरुप में पहुंचा है | अतः जितना हम इतिहास में पीछे जायेंगे उतना हम भारतीय प्रशासन की कार्यप्रणाली को विभिन्न एतिहासिक परिपेक्ष्य के सम्बन्ध में समझ सकने में सक्षम हो पाएंगे |
मोहनजोदड़ो एवं सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों की प्राप्ति के पश्चात प्राचीन काल में नगरीय प्रशासन के होने की पुष्टि हो चुकी है | अतः यह स्वयं ही सिद्ध हो जाता है कि अगर नगरीय प्रशासन था तो उसका संचालन भी प्रशासनिक अधिकारियों व कार्मिकों द्वारा किया जाता था | वैदिक काल में प्रशासन का स्वरुप राजतंत्रात्मक था जिसमें जन-प्रिय राजा का चुनाव एक 'समिति' नामक नागरिक संस्था द्वारा किया जाता था |उत्तर वेदिक काल के बाद राजा का पद पैत्रक हो गया | राजा की सहायता करने हेतु सभा तथा मंत्रिपरिषद का गठन किया जाता था | केंद्रीय प्रशासन विभिन्न विभागों द्वारा संचालित किया जाता था | गाँवो के समूह बनाने के साथ ही प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण को बढावा मिला | 10 ग्रामों का अधिकारी ग्रामिक, 20 का विशपति, 100 का शतग्रामी और 1000 ग्रामों का अधिकारी अधिपति कहलाता था |
मौर्यकाल में कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र को प्राचीन भारतीय लोक प्रशासन के व्यवहारिक पक्षों को समझने हेतु प्रामाणिक ग्रन्थ माना गया है | इस ग्रन्थ में कौटिल्य ने शासन कला एवं राजनीति का ज्ञान तथा कृषि, व्यापार, धर्म-अधर्म ,दर्शन , तर्क जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डाला है |
कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राजा को राज्य के शासन के सफल संचालन हेतु योग्य मंत्रियों तथा कर्मचारियों की नियुक्ति करने के साथ-साथ राज्य की आय बढानें के लिये सुदृढ़ आर्थिक नीति का पक्ष लेते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाने पर बल देने को कहा है | अर्थशास्त्र में धर्मनिरपेक्ष राज्य की विशेषताओं का वर्णन करते हुए किसी भी राज्य के लिये इसे उपयुक्त माना है | भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिये मौर्यकाल में कार्मिकों के लिये पुरुस्कार और दंड दोनों की व्यवस्था की गयी थी | कौटिल्य की अर्थशास्त्र के अतिरिक्त मेगास्थनीज की इंडिका , फाह्यान की फू-कुओ-की(बुद्ध के देश की गाथा) तथा ह्वेनसांग की सि-यू-की (पश्चिमी दुनिया का वृतांत) में भी प्राचीन भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन किया गया है |
क्रमशः
Sir nice post....plz update regularly
जवाब देंहटाएंThanks.. I will..
हटाएंGood material
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